कमल की खेती

kamal 4अजब चक्कर है कमल की खेती हुई नहीं मगर देश में कमल खिल गए .बी जे पी ने अपना चुनाव चिन्ह कमल का फूल लिया मगर कमल के फूल तो कहीं दिखते नहीं . अभी यह भी पता लगा कि यह राष्ट्रीय फूल भी है .

किसी भी नेता के हाथ में कमल का फूल दिखाई नहीं पड़ा .कितना सुन्दर फूल होता है हाथ में पकड़ते तो कुछ तो सुन्दर लगते .कमल का फूल थोडा बड़ा होता है .मगर चलता .अब देखो विष्णु भगवान ने भी तो पकड़ा हुआ है .पता नहीं क्यों नही पकड़ा .

चाचा नेहरू ने तो गुलाब का फूल पसंद किया था अपने कोट में लगाए रहते थे .जरूरत पड़ने पर कोट से निकाल कर किसी को दिया या किसी के बालों में लगाया या नहीं .पता नहीं . उनका तो चुनाव चिन्ह भी गुलाब नहीं था .मगर वे सब देसी विदेशी फूलों को पसंद करते थे .यह जानकारी में है .

इन लोगों ने कमल के फूल से नहीं .उसकी फोटो से ही काम चला लिया .वो भी प्लास्टिक से बना हुआ .हद हो गयी .प्लास्टिक का कमल का फूल नहीं बनवाया .कमल के फूल की फोटो को प्लास्टिक में ढलवा लिया . प्लेटो के “रिपब्लिक” काव्यशास्त्र के अनुसार देखें तो सत्य से दुगना नहीं तिगुना दूर हो गया .प्लेटो अगर जिन्दा होते तो पता नहीं इनके लिए किस सजा का प्रवधान करते .

संस्कृत साहित्य में सरोवर में कमल दल के खिलने का कितना मनोहारी वर्णन है और रात को कुमुदिनी के खिलने का, मगर यहाँ कमल की फोटो “बिल्ला” बन गयी और नेताओं के कुर्ते पर चिपक गई .न रूप , न रंग, न गंध .

कमल का इतना अपमान ,राष्ट्रीय फूल का इतना अपमान  .कोई तो बोलता .गले में फूलों की माला तो पडी थी न .सिर झुकवा झुकवा कर गले में पड़वाई थी और कुछ तो इनती बड़ी थीं कि गले में पडती तो उसके भार से ही नेता जी स्टेज पर ही गिर जाते .फिर कमल के फूलों की माला क्यों न पहनीं ?

ऐसा ही करना था तो कमल का फूल ही क्यों चुना कुछ और चुन लेते .गेंदे का फूल भी बुरा नहीं होता .तो क्या कमल इस लिए चुना कि इसमें लक्ष्मी जी का वास होता है .और नहीं तो क्या .

मुझे पता है भारतीय संस्कृति धर्म दर्शन और भी न जाने क्या क्या सोच कर कमल तो ले लिया मगर उसे निभाए कौन ? गाँव में ,तालाब या कहिये सरोवर में कमल खिलते थे तालाब को पाट दिया .उस तालाब की जमीन पर कालौनी काट दी और कमाई कर ली .जिस ठहरे हुए पानी में कमल उगता है .उसे उलीच कर ये लोग पी गए .

अब कमल का फूल ट्यूलिप का फूल तो है नहीं जिसे उगा कर यूरोप भेज कर कमाई की जा सके .गुलकंद उसका बनता नहीं .बीजों से मखाने बनते हैं .जो व्रत में खाने और शवयात्रा में फेंकने के काम आते हैं .बस . ऐसे फूल के लिए मैं क्यों रो रहा हूं ?

ये प्लास्टिक के कमल वाले मेरे दिल का हाल क्या जाने ?

ए उपाध्याय

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