एक तमाशा मेरे सामने

x716 वीं लोकसभा के लिए देश भर में आम चुनाव हो गए .देश में लोकतंत्र की महानता के गीत गाये गए .नारे लगाये गए .नेताओं के कट आउट चौराहों पर खड़े हो गए .उनके चमकते चेहरे वाले पोस्टर दीवारों  पर चिपक गए .सिरों पर टोपियां सज गयीं आसमान में हैलीकॉप्टर गडगडा गया .

नेताओं ने एक दूसरे को अपना दोस्त बतलाते हुए कहा कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता .अत हमारे मनोरंजन के लिए एक दूसरे को गरियाया .कुर्ते की बाजुएं ऊपर चढा कर क्या थ्री डी में खेल दिखाया .विद्वान पत्रकारों ने टी वी और अख़बारों में लिख कर बतलाया कि देश के बारे में उन्हें कितना गहन ज्ञान है .एक हम ही हैं जो इस महानता को नहीं समझते हैं .

चुनाव से पहले देश के सूचना आयुक्त ने और  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनैतिक दलों को आर टी आई की परिधि में आना चाहिए .सभी दल इस पर एकत्रित और एकमत  हो गए और सुप्रीम कोर्ट की बात नहीं मानी .उसके आदेश की अवहेलना की गयी . किसी ने चुनाव के दौरान यह मुद्दा नहीं उठाया .लोकतंत्र में देश की न्याय व्यवस्था का और सर्वोच्च न्यायलय का इससे बड़ा अपमान क्या होगा की देश के राजनैतिक दल ही उसके आदेश नहीं मान रहे हैं. मगर यह चुनावी मुद्दा नहीं बना .

इसी प्रकार राजनैतिक दलों को मिलने वाले चंदे का मामला था यह मांग थी कि २०,००० रूपये से कम रूपये भी दान देने वालों के नाम और पते राजनैतिक दलों द्वारा सार्वजनिक किए जाएँ .एक दल , आप पार्टी को छोड़ कर कोई भी दल इस के लिए राजी नहीं हुआ .राजनैतिक दलों द्वारा इस चुनाव में हजारों करोड़ रूपये खर्च किए गए .ये हजारों करोड़ रूपये  किन लोगों ने उन्हें दिए उनके नाम और पते ये राजनैतिक दल देश और उसकी संस्थाओं  को बतलाने के लिए राजी नहीं हैं . सभी दल एक मत से एकाकार हैं ये रूपये कहां से आए ये हम नहीं बतलायेंगे .चुनाव में यह बात भी तो मुद्दा नहीं बनी  थी .

हमारे महान लोकतांत्रिक देश में अभी तक ऐसा कोई कानून नहीं है जिससे हम चोरों हत्यारे या बलत्कारी लोगों को चुनाव में खड़े होने से रोक सकें .बस यही ओट है .सभी दलों ने ऐसे लोगों को संसद में भेजने का बीड़ा उठाया और यह जिम्मेदारी जनता पर डाल दी के वे चाहें तो उन्हें वोट न दें .क्या इस देश में सभी हत्यारे और बलत्कारी ही भरे हुए हैं जो इन दलों को बेदाग नेता ही नहीं मिलते .सभी ने ऐसे लोगों को टिकट दिया और उन्हें जिताने के लिए खूब प्रचार भी किया .

भ्रस्टाचार के मुद्दे पर भी कुर्तें की बाजुएँ चढ़ाई गयीं .सप्तम सुर लगाया गया .रॉबर्ट वाड्रा का नाम भी आ गया .अरे भाई ,इतना ही विश्वास था तो उसके खिलाफ एफ आई आर क्यों नहीं लिखवा दी  .राजस्थान में तो आप ही की सरकार है श्री वाड्रा  ने वहाँ भी ऐसे ही लाभप्रद सौदे किए हैं तो आप भ्रस्टाचार के खिलाफ कर क्या रहे हो ? कोयले घोटले में सभी दलों के नेता और उनके समर्थक उद्योगपति शामिल हैं .क्या सहमति है किसी ने दूसरे की की चादर नहीं हटाई और रिलाइंस और गैस मामले में तो इन सब ने साबित कर दिया कि विकास के इंजन के सामने सब नतमस्तक हैं .

ऐसा भी नहीं नहीं है कि इस खेल में केवल नेता ही शामिल हैं और भी बहुत लोग हैं .देश में अभी जाति गत आधार पर गणगणना के आंकड़े नहीं आए हैं मगर टी वी पर आने वाले महान पत्रकारों को ,समाजशास्त्रियों को पता है किस क्षेत्र में कितने हिंदू ,कितने मुसलमान ,कितने यादव ,कितने राजपूत रहते हैं .वो किसे वोट करेंगे यह  उन्हें पता है और किसे नहीं करेंगे उसके कारण भी उन्हें पता है . कितने अन्तर्यामी हैं . टी वी पर और अख़बारों में जाति और धर्म के आधार पर खूब विश्लेषण हुआ किसी महान पत्रकार को या विद्वान को शर्म नहीं आई कि अगर ऐसे ही धर्म और जाति के आधार पर समाज बंटा रहा और उनका इसी तरह विश्लेषण किया जाता रहा तो तो समतामूलक समाज का निर्माण कैसे होगा और कैसे यह लोकत्रंत कैसे बचेगा .

कहने को ये चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा गया .मगर यह कैसा विकास है कि देश में अरब पतियों की संख्या बढ़ती रही है और दूसरी ओर यही फैसला नहीं हो पा रहा है गरीब का पेट १५ रुपए में भरेगा ,पांच में भरेगा या एक रुपया ही काफी है .देश के कोने कोने  में आई. आई. एम. हैं और अब तो हर शहर में एम. बी. ए. की पढाई करने वाले और करवाने वाले हैं उन में से कोई सामने आ कर यह नहीं बतला सका यह कौन सा विकास है जो मोदी जी की सरकार करेगी जो कांग्रेस सड़सठ साल में नहीं कर सकी .

देश के समाजशास्त्रियों को ,देश के विश्विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को ,पढाने वाले शिक्षकों को ,व्यपार मंडलों के प्रतिनिधियों को ,मजदूर संगठनों को क्या हुआ था ? सब कुछ क्यों राजनैतिक दलों पर छोड़ दिया गया .ये सब  क्यों खामोश थे.

मेरी उंगली पर अब भी वोट की स्याही लगी है और मैं सोच रहा हूं कि मैंने लोकतंत्र के उत्सव में भाग लिया या एक तमाशा मेरे सामने हुआ जिस में मैं तमाशा बन गया .

अशोक उपाध्याय

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