अराजकता की व्यवस्था

2पिछले दिनों भारतीय राजनीति में अनार्की शब्द का बहुत प्रयोग हुआ और इतना  हुआ कि टी वी पर चर्चा के लिए आए विद्वान लोग शब्दकोश लेकर शब्द का अर्थ बतलाने लगे कि अनार्की का मतलब अराजकता है और अराजकता का अर्थ है किसी व्यवस्था का न होना.

दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल के केन्द्र सरकार के सामने धरने पर बैठते ही उन्हें अराजकता वादी बना दिया गया . लोकतान्त्रिक व्यवस्था में क्या किसी का धरने पर बैठना अराजकतावादी होना है .लोकतंत्र के कथित विद्वानों के अनुसार उत्तर है , हाँ , किसी मुख्यमंत्री का इस तरह बैठना अराजकता है .मुख्यमंत्री बनते ही अब वे एक व्यवस्था के हिस्से हैं और उसे चलाए रखना उनका काम है .अब वे उस व्यवस्था का विरोध नहीं कर सकते .इसलिए वे अराजकतावादी हैं .

उनका कहना है कि सरकार में रह कर सरकार का विरोध करने से लोकत्रंत ही खतरे में पड़ जाएगा .जब सरकार ही संविधान का उलंघन करेगी तो संविधान की रक्षा कौन करेगा .देश में अराजकता फ़ैल जायेगी और देश पर संकट आ जाएगा .

इन लोगों की लोकतंत्र की समझ ही उथली है .उनके लिए देश के दो हिस्से हैं .एक ओर सरकार है और दूसरी ओर जनता है .जनता का अधिकार है कि वह धरना प्रदर्शन करे .सरकार का काम है उन पर शाशन करे .उन्हें नियंत्रित करे .उन के लिए काम करे .उनकी इसी समझ के कारण देश शाशक और जनता के बीच बंटा हुआ है .इसी लिए इन दोनों के बीच केवल पांच साल में एक बार संवाद होता है.फिर पांच साल तक सरकार देश को हांकती है . और यही व्यवस्था , हर पांच साल बाद .नए चेहरों द्वारा चलाई जाती है . बदलता कुछ नहीं .

अरविन्द ने सरकार में रह कर ,धरने पर बैठ कर ,इसी व्यवस्था को चुनौती दी .क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन इसी से होना है .ऐसे में इस संविधान के अनुसार चलने वाली व्यवस्था के आलम बरदारों के बीच खलबली मचना स्वाभाविक ही है .

अब सवाल यह है कि इस हालत में व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा ? वह नहीं होगा . हर पांच साल बाद चेहरे बदलेंगे .बस .  राज्य सरकार केन्द्र सरकार को पत्र लिखेगी .फिर अनुस्मारक लिखेगी .फिर अनुस्मारक दो लिखेगी . फिर कमेटी बनेगी .फिर रिपोर्ट आयेगी .फिर चर्चा होगी .फिर संशोधन होंगे .फिर रिपोर्ट बनेगी .फिर चुनाव आयेंगें . फिर पत्र लिखेंगे . सब काम नियम ,कानून और संविधान के अनुसार होगा .होगा कुछ नहीं .बदलेगा कुछ नहीं . ( सड़सठ साल हो गए सौ भी हो जायेंगे .और जो हुआ है वह न्यूनतम है )

उसके कुछ ही दिन बाद ही  संसद में आंध प्रदेश के बंटवारे को लेकर विवाद हो गया .जो राजनीति की मामूली सी भी समझ रखते हैं उन सब को मामूम था कि आज संसद में क्या होने वाला है .संसद सदस्य पहले से ही कह रहे थे कि हम अप्रत्याशित करेंगे .कुछ खा लेंगे. मगर आंध प्रदेश का बंटवारा नहीं होने देंगे .आंध प्रदेश का बंटवारा सही है या गलत यह इस लेख का विषय नहीं है . यह तय था कि बंटवारे का बिल आते ही हंगामा होना तय है .कांग्रेस और बी जे पी मिल कर इस बिल को आगे बढाना चाहते थे .जिस से आगामी चुनाव में इसके सहारे वोटों की फसल काटी जा सके . और जो इस बंटवारे के विरोध में थे उन्हें क्या वोट नहीं चाहिए था .सो उन्होंने जम कर विरोध किया .

संविधान के अनुसार चलने वाली संसद ,जिस में पैसे लेकर सवाल पूछे जाते हैं ,जिस में अपने पक्ष में वोट डलवाने के लिए रूपये लिए और दिए जाते हैं .उस संसद के सदस्यों ने सोचा था कि जब हम बी जे पी और कांग्रेस ही आपस में मिल गए हैं तो हम आंध प्रदेश का बंटवारा करवा ही लेंगे .विरोधी गला फाड़ कर चुप हो जाएगें .बहुमत की विजय होगी .सब कानून और संविधान सम्मत होगा .

अपनी बात न सुने जाने पर ,अपने को अल्पमत में पा कर विरोधियों ने जो किया वह सब के सामने है .सदन की कार्यवाही स्थगित हो गई . इस घटना के बाद जो कुछ कहा गया वह महत्वपूर्ण है .कहा गया आज भारतीय संसद कलंकित हो गयी .संविधान की मर्यादा तार तार हो गयी .आज संसदीय इतिहास का सबसे काला दिन है.

सुश्री मीरा कुमार ,सुषमा स्वराज ,लाल कृष्ण अडवानी ,कपिल सिब्बल ,गुरदास गुप्ता कौन नहीं था जो इस निंदा में शामिल नहीं था .शाम होते होते .टी पर आए एंकर और उनके मेहमान रोने बिसूरने लगे कि आज भारत का लोकतन्त्र कलंकित हो गया . विश्व में महान भारत की नाक कट गई .भारत के इतिहास में बहुत शर्मनाक दिन है .सभी इस अराजकता से दुखी हो रहे थे .

किसी ने पलट कर यह नहीं पूछा कि ऐसा क्या हो गया जो पहले नहीं हुआ .ममता बनर्जी ने इसी तरह  स्पीकर के सामने जाकर माइक खींचा था और कागज़ उठा लिए थे .लोकपाल बिल की प्रस्तुति के समय रात बारह बजे इसी तरह बिल फाड़ दिया गया था .आज संसदीय मर्यादा की दुहाई देने वाले माननीय श्री नरेश अग्रवाल जी  को याद होगा कि कुछ ही दिन पहले इसी सदन में उन्होंने अपने साथी संसद सदस्य की गर्दन पकड कर उसे धक्का दे दिया था .

प्रदेशों की विधान सभाओं में ऐसे दृश्य आम हैं .माइक उखाडना  .कागज़ फाड़ना .लात घूंसे से मारना .सही है .लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसा नहीं होना चाहिए .लेकिन ऐसा ही होता है .जब दूसरे पक्ष का सब कुछ दांव  पर लगा हो तो ऐसा होना स्वाभाविक भी है .कुछ समय पहले  ही में जापान ,इटली और तुर्की की संसद में ऐसी धक्का मुक्की हुई .पिछले सप्ताह उक्रेन की संसद में भी सिर फुटव्वल हुई.

किसी भी लोकतान्त्रिक  देश में ऐसी घटनाएँ शुभ नहीं हैं .मगर भारत में इसे जिस तरह अराजकता बतला कर ,कानून और संविधान का अपमान बतला कर विलाप किया जा रहा है उसके कारण दूसरे हैं .आप को कुछ वर्ष पहले आई हिन्दी फिल्म दामिनी याद होगी .जिसमें अमरीश पुरी ने एक वकील की भूमिका की थी .जो नियम कानून व्यवस्था बतला कर ,सारी जोड़ तोड़ कर ऐसी व्यवस्था बनाए रखना चाहता है जिस में नायिका दामिनी को न्याय न मिले और वह उसे पागल घोषित कर मरवा दे .वकील अमरीश पुरी के इस षडयंत्र दामिनी के परिवार के सदस्य भी शामिल होते हैं . वकील अमरीश पुरी लगातार अपने षडयंत्र में सफल होता रहता है जब तक कि सिरफिरा नायक सन्नी देयोअल आकर उसकी उंगली  नहीं पकड़ लेता .

दुर्भग्य से हमारी संसद भी उसी स्तिथि  में आ गई है .वह शोषण की व्यवस्था को नियम कायदे कानून से बनाए रखना चाहती है .उसमें जरा सा भी परिवर्तन या उसकी आहट ही उसे अराजकता लगती है .

इन नेताओं की  आम जनता से इतनी दूरी है कि इन्हें पता ही नहीं कि वे किस हाल में जी रहे हैं वे जिस दुनिया में रहते हैं वहाँ से वे बस में चढती भीड़ या राशन की दुकान के सामने राशन लेने के लिए मारा मारी को ही अराजक भीड़ मान कर बेहोश हो कर गिर पड़ेंगे .

परिवर्तन  की इस आवाज को ये लोग अराजकता क्यों मानते हैं ? क्यों इस आवाज को नियम कायदे और कानून से दबा देना चाहते हैं ? यह विरोध की आवाज ही तो लोकत्रंत की शक्ति है .या कहिए इस आवाज को लोकत्रंत ने ही इतनी शक्ति दी है कि वह सुनी जाय और आप ही उसे अराजक बतला कर कुचलना चाहते हो .

हम सब को ध्यान देना चाहिए जब हम ऐसी आवाजों पर ध्यान नहीं देते हैं .अनसुना करते हैं .अराजक कह कर दबा देते हैं .तब यही आवाजें कुछ समय बाद विस्फोट के रूप में सुनाई देती हैं. .अच्छा हो समय रहते इस लोकतान्त्रिक देश में हर छोटी बड़ी आवाज को ध्यान से सुना जाय .

अशोक उपाध्याय

Further reading on subject

http://philosophersforchange.org/2012/03/07/re-thinking-revolution-a-social-anarchist-perspective/

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