अमरीका का नाम नहीं लेना

iraq-4

आज ईराक जल रहा है .भारतीय मीडिया कुछ समय तक तो आँखें बंद कर बैठा रहा कि उस क्षेत्र में तो यह सब होता ही रहता है इसलिए हमें रिपोर्ट करने की जरुरत नहीं है किन्तु अब जब विद्रोहियों ने ईराक के तीन शहरों पर कब्जा कर लिया है और भारत के ४० नागरिक बंदी बना लिए तो उसे मजबूरी में रिपोर्टिंग शुरू करनी पडी है .उनकी नजर में ईराक की यह समस्या नूरी अल-मलिकी के सत्ता सम्भालने के बाद शुरू हुई .

उनकी यह प्राथमिक अवधारण कितनी गलत है यह सब जानते हैं .सब जानते हैं कि अमरीका और यूरोप के देश तेल के कारण इस क्षेत्र में रूचि रखते हैं .पहले इरान में शाह पहलवी थे जो अमरीका के समर्थक थे .उसके बाद अमरीका ने साउदी अरब के राज परिवार से संबंध बढ़ा कर अपने हितों का संरक्षण किया .फिर उसे ईराक के सद्दाम हुसेन भी प्यारे लगने लगे .जब उन्होंने अमरीका की बात सुनने से इंकार कर दिया तो वे दुश्मन हो गए .

दशकों चली इरान और ईराक की लड़ाई के मूल में तेल और अमरीका और उसके मित्र देशों के हित थे जो इस लड़ाई का फायदा उठा रहे थे .आज यह भी पूरी दुनिया जानती है कि अमरीका द्वारा ईराक पर हमला किया जाना घोर अपराध था .अमरीका भी जानता था कि ईराक के पास वेपन ऑफ मास डिस्ट्रेकशन नहीं है .अमरीकी सरकार और उसके तंत्र ने एक देश ही नहीं एक सभ्यता को नष्ट कर दिया .अमरीका और उसके मित्र राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के खिलाफ जा कर एक स्वतंत्र देश पर हमला किया था मगर किसी को जरा भी अफ़सोस नही है .

मानवीयता की दुहाई देने वाले और विश्व शक्ति बनने का सपना देखने वाले भारत के लोग इस मुद्दे पर चर्चा ही नहीं करते हैं कहीं जबरा बुरा न मान जाय .हमारे हित उससे जुड़े हैं वह महाशक्ति है .हमें अपने हित देखने चाहिए .इस चक्कर में हम उसकी दुम बन गए हैं .

जब अमरीका और उसके मित्र राष्ट्रों ने सद्दाम के लोकतंत्र ( कथित तानाशाही ) को खत्म करने के लिए ईराक में प्रवेश किया था तो अब वह लंगड़ा लूला लोकतंत्र स्थापित कर वहाँ से क्यों निकल जाना चाहता है .आज की हालत तो सद्दाम से समय से भी बुरी है .यह सवाल कोई क्यों नहीं पूछ रहा .क्यों अमरीका अपने आप को लोकतंत्र का मसीहा मान कर अपने घर से बाहर निकला था और इराक को बर्बाद कर वापस लौट रहा है . इस नुकसान की भरपाई अमरीका नहीं तो कौन करेगा .

तीन महीने पहले अमरीका और उसके मित्र देश इरान के खिलाफ प्रतिबंध लगा रहे थे कि वह अपने यहाँ यूरेनियम संवर्धन का काम कर रहा है .उस पर हवाई हमले कर उसके संयंत्रों को उड़ा देने की बात कर रहे थे आज वही अमरीका इरान से मदद मांग रहा कि वह इराक संकट हल करने में उसकी मदद करे .क्यों करे .सारी दुनिया उसकी मर्जी से चले .

वैसे सारी जिम्मेदारी अमरीका और उसके मित्र देशों की है ऐसा भी नहीं है जब से इस क्षेत्र में तेल मिला है लगता है इन देशों का विकास रुक गया है .अपने देश का सब कुछ ये तेल बेच कर ही खरीदते हैं .इन देशों में तेल बेचने को लेकर गलाकाट प्रतियोगिता है .उनकी आपस में यह प्रतियोगिता , जो अब एक हद तक दुश्मनी में बदल चुकी है .उनकी यह आपसी दुश्मनी खरीददार देशों के हित में जाती है .फिर वे दुश्मनी की आग में पेट्रोल डालने से क्यों चुकेंगे .

ईराक की इस लड़ाई से सब को नुकसान ही होगा ऐसा भी नहीं .कई देशों की रुकी हुई अर्थव्यवस्था चल निकलेगी जिन देशों के पास तेल के भंडार हैं वे अब कमाई करेंगे .और अगर कहीं यह लड़ाई लंबी खिंच गयी तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कुछ देशों के नक्शे ही बदल जाएँ .

यहाँ एक बात का उल्लेख करना जरूरी है हमें सिखाया गया है इस्लाम शांति का धर्म है .हजारों धर्म गुरु हैं .करोड़ों मस्जिदें हैं .इस लड़ाई में दोनों तरफ मुसलमान हैं चाहे वे शिया हों सुन्नी हों या खुर्द .दोनों तरफ मुसलमान का खून जमीन पर गिर रहा है और उन्हें समझाने वाला कोई नहीं है

पता नहीं ऊपर वाले को क्या मंजूर है .

ए उपाध्याय

 

 

 

 

Share this:

PinIt
Top